क्रिसमस क्यों मनाया जाता है? Why is Christmas Celebrated?

क्रिसमस क्यों मनाया जाता है? Why is Christmas Celebrated?

Why is Christmas Celebrated in Hindi – क्रिसमस ईसाइयों का प्रमुख त्योहार है. क्रिसमस ईसा मसीह के जन्म को स्मरण करने के लिए मनाया जाता है, जिन्हें ईसाई ईश्वर का पुत्र मानते हैं. 

क्रिसमस एक ऐसा त्योहार है, जिसे विदेशों में ही नहीं बल्कि भारत में भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, इस त्योहार को लेकर लोगों में काफी उत्साह रहता है और लोग इसे नए साल के रूप में भी देखते हैं.

क्रिसमस के दिन लोग केक काटते हैं, एक-दूसरे को उपहार देते हैं और पार्टियों का आयोजन कर इस त्योहार को मनाते हैं. यह त्योहार प्रेम और सद्भाव की मिसाल कायम करता है.

आइए विस्तार से जानते हैं कि क्रिसमस क्यों मनाया जाता है.

क्रिसमस क्यों मनाया जाता है? Why is Christmas Celebrated?

What is Christmas in Hindi – प्रेम और सद्भाव के रूप में मनाए जाने वाले क्रिसमस पर्व का इतिहास कई सदियों पुराना है. 

बाइबिल (Bible) के अनुसार ईसाई धर्म के मुख्य देवता ईसा मसीह (Jesus Christ) का जन्म इसी दिन मदर मैरी के गर्भ से हुआ था, इसलिए इस पर्व को मनाया जाता है.

साथ ही यह भी माना जाता है कि ईसा मसीह के जन्म से पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी गई थी कि पृथ्वी पर ईश्वर का एक पुत्र जन्म लेगा जो बड़ा होकर राजा बनेगा और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी.

इसके अलावा ईसा मसीह के जन्म से पहले यह भी भविष्यवाणी की गई थी कि, ईश्वर का यह पुत्र पूरे विश्व को दुख से मुक्ति दिलाएगा और लोगों का मार्गदर्शन करेगा और उन्हें सही रास्ते पर चलना सिखाएगा और पूरी दुनिया का उद्धार करेगा.

आपको बता दें कि मदर मरियम (मैरी) की शादी यूसुफ (जोसेफ) से हुई थी. ईसाई धर्मशास्त्र के अनुसार, मैरी ने कुंवारी रहते हुए पवित्र आत्मा के दिव्य आशीर्वाद से यीशु की गर्भधारणा की, और यूसुफ के साथ यहूदिया प्रांत के बेथलहम नामक जगह पर रहने लगी. यहीं पर एक रात गौशाला में ईसा मसीह का जन्म हुआ था.

उसी दिन, आकाश में एक तारा बहुत चमक रहा था और इससे लोगों को एहसास हुआ कि उन्हें रोम के शासन से बचाने के लिए मसीहा ने जन्म लिया है. इस घटना के चलते लोग ईसा मसीह के जन्मोत्सव को क्रिसमस डे के रूप में मनाने लगे.

क्रिसमस 25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है? Why is Christmas Celebrated on the 25th December?

क्रिसमस पर्व को लेकर अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग विचार हैं. वहीं ईसाई धर्म के लोगों के लिए इस त्योहार का एक अलग ही महत्व है.

प्राचीन काल में ईसा मसीह के जन्मदिन को लेकर ईसाई समुदाय में काफी मतभेद था, क्योंकि उनके पवित्र ग्रंथ बाइबिल (Bible) में कहीं भी ईसा मसीह के जन्मदिन की पुष्टि नहीं की गई है. 

पहले कई चर्च और बड़े धार्मिक संस्थान ईसा मसीह का जन्मदिन अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार मनाते थे, लेकिन ईसा मसीह के जन्मदिन को लेकर संशय को लेकर ईसाई समुदाय काफी चिंतित था.

आपको बता दें कि शुरुआत में ईसा मसीह के जन्म के बारे में ईसाई धर्म के लोगों की एक राय नहीं थी, कोई 14 दिसंबर, कोई 10 जून और कोई 2 फरवरी को उनका जन्मदिन मनाते थे. 

इसके कारण सभी समूहों के अनुयायियों ने मिलकर एक ऐसा दिन सुनिश्चित करने का निर्णय लिया जिस दिन ईसा मसीह का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया जा सके.

वहीं, तीसरी शताब्दी में, सभी के परामर्श के बाद, यह निर्णय लिया गया कि 25 दिसंबर को ईसा मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाया जाएगा.

25 दिसंबर के दिन को चुनने के पीछे का कारण यह था कि यह दिन साल का सबसे बड़ा दिन होता है. इस वजह से इस दिन बड़ा दिन (Big Day) भी कहा जाता है. 

नियम तो बना, लेकिन फिर भी कई लोग ईसा मसीह का जन्मदिन अपने-अपने तरीके से मनाते चले जा रहे थे.

एक और ध्यान देने वाली बात यह है कि कट्टरपंथी ईसाइयों और शुद्धतावादी ईसाइयों ने हमेशा क्रिसमस के त्योहार को मनाने का विरोध किया है.

वहीं साल 1645 में ओलिवर क्रॉमवेल और उनकी शुद्धतावादी सेना ने इंग्लैंड पर कब्जा कर लिया और इसका एक असर यह हुआ कि क्रिसमस के त्योहार को मनाने पर रोक लगा दी गई. लेकिन कुछ समय बाद जब चार्ल्स द्वितीय ने इंग्लैंड का शासन संभाला तो जनता की मांग पर क्रिसमस का त्योहार फिर से मनाया जाने लगा.

बोस्टन में तो 1659 से 1681 तक क्रिसमस के त्योहार को मनाने पर पूर्णतः कानूनी पाबंदी थी, यहां तक कि इसे मनाने वालों को 5 शिलिंग का जुर्माना भी भरना पड़ता था, जो उस समय के हिसाब से काफी था. 

इसके अलावा अमेरिकी क्रांति के बाद अंग्रेजी तौर-तरीकों को भी बुरा माना जाने लगा था. इसके बाद 26 जून, 1870 को अमेरिका में पहली बार क्रिसमस को संघीय अवकाश घोषित किया गया.

इस तरह क्रिसमस का त्योहार धीरे-धीरे पूरी दुनिया में मनाया जाने लगा. वहीं, कई देशों में इस दिन राजकीय अवकाश भी घोषित किया गया है.

हालांकि 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाने को लेकर अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं. क्रिसमस 12 दिनों के त्योहार क्राइस्टमास्टाइड (Christmastide) की शुरुआत का भी प्रतीक है.

क्राइस्टमास्टाइड, जिसे आमतौर पर क्रिसमस के बारह दिन कहा जाता है, 25 दिसंबर से 5 जनवरी तक 12 दिनों तक रहता है.

क्रिसमस पर लोग तरह-तरह के व्यंजन बनाते हैं, केक काटते हैं, दोस्तों और अपने परिजनों के साथ से मिलकर एक-दूसरे को उपहार देते हैं. 

इसके साथ ही परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर क्रिसमस ट्री (Christmas tree) को सजाने की भी परंपरा है.

ईसा मसीह के जन्म की कहानी – Story of the birth of Jesus Christ

क्रिसमस डे कैसे मनाया जाता है? How is Christmas Day celebrated?

क्रिसमस ईसाइयों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है. इस दिन ईसाई समुदाय के लोग अपने घरों और गिरजाघरों की सफाई करते हैं. लोग सज धज कर तैयार होते हैं और सार्वजनिक प्रार्थना करने के लिए चर्च जाते हैं.

लोग अपने घरों को चमकदार, रंगीन रोशनी और क्रिसमस ट्री से सजाते हैं. घर पर परिवार के सभी सदस्य क्रिसमस ट्री के पास इकट्ठा होते हैं और प्रार्थना करते हैं और खुशहाली की दुआएं मांगते हैं. 

इस त्योहार पर ईसाई अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को मिठाई और उपहार भेट देते हैं. सभी माता-पिता अपने बच्चों को उपहार और खिलौने देते हैं.

क्रिसमस प्यार और शांति का त्योहार है और यह हमें जीवन को खुशहाल और सार्थक बनाना सिखाता है.

विश्व में सबसे पहले “क्रिसमस दिवस” किसने मनाया? Who celebrated “Christmas day” first in the world?

विशेषज्ञों के अनुसार क्रिसमस शब्द की उत्पत्ति क्राइस्ट (Christ) शब्द से हुई है. 

आपको बता दें कि दुनिया का पहला दर्ज किया गया क्रिसमस डे (Christmas Day) तीसरी शताब्दी में रोम में 25 दिसंबर, 336 ई. को मनाया गया था. प्रभु यीशु के जन्म की तारीख उस समय बहुत रुचि का विषय थी.

क्रिसमस ट्री का इतिहास – History of Christmas Tree

ईसाई धर्म में, क्रिसमस ट्री यीशु मसीह के जन्म और पुनरुत्थान का प्रतीक है. क्रिसमस के पावन पर्व पर क्रिसमस ट्री का सबसे ज्यादा महत्व होता है, साथ ही इस दिन पेड़ों को सजाने की परंपरा सालों से चली आ रही है.

पेड़ की शाखाओं और झाड़ियों को अमरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है और कहा जाता है कि यह क्रूस पर मसीह द्वारा पहने गए कांटों के मुकुट का प्रतीक है.

साथ ही क्रिसमस ट्री को सजाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली हर सजावट का एक विशेष महत्व माना जाता है.

क्रिसमस ट्री को जीवन की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है. इसे लेकर ऐसी मान्यता भी है कि क्रिसमस ट्री को सजाने से बच्चों की उम्र बढ़ती है. इसी वजह से क्रिसमस के दिन क्रिसमस ट्री को पूरे परिवार के साथ मिलकर सजाया जाता है.

क्रिसमस ट्री की उत्पत्ति के बारे में कई मिथक प्रचलित हैं. एक किंवदंती कहती है की देवदार के पेड़ भगवान की भलाई का प्रतिनिधित्व करते हैं. 

15वीं शताब्दी में प्रचलित एक और मिथक सेंट बोनिफेस की कहानी बताता है कि 8वीं शताब्दी में एक मानव बलि के बदले एक ओक के पेड़ को काटकर मानव बलि को विफल कर दिया गया था; उसके स्थान पर एक देवदार का पेड़ उग आया, जिसकी शाखाएं मसीह के शाश्वत सत्य का प्रतिनिधित्व करती थीं.

इसके अलावा यह भी माना जाता है कि यीशु के जन्म के समय खुशी व्यक्त करने के लिए सभी देवताओं ने सदाबहार के पेड़ को खूबसूरती से सजाया था और तभी से क्रिसमस ट्री को क्रिसमस का प्रतीक माना जाने लगा और क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा प्रचलित हो गई.

लेकिन क्रिसमस ट्री की वास्तविक उत्पत्ति मध्य युग के दौरान वर्तमान जर्मनी में निहित प्रतीत होती है. 

कोई भी वास्तव में इस बात की पुष्टि नहीं करता है कि देवदार के पेड़ को क्रिसमस के पेड़ के रूप में कब से इस्तेमाल किया जाने लगा. लेकिन इसकी शुरुआत शायद लगभग 1000 साल पहले उत्तरी यूरोप में हुई थी.

कौन हैं सांता क्लॉस? Who is Santa Claus?

सांता या सांता क्लॉज को फादर क्रिसमस और अन्य नामों से भी जाना जाता है. 

सांता पश्चिमी ईसाई संस्कृति का एक महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध पात्र है, जो हर साल क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बच्चों के लिए खिलौने और कैंडी उपहार लाता है. सांता बच्चों को उपहार देते हैं और उन्हें सुखी जीवन जीने का आशीर्वाद देते हैं.

उनका मिलनसार स्वभाव, खुशमिजाज व्यक्तित्व और ऊर्जावान रवैया छुट्टियों के मौसम को खुशी का समय बनाने में मदद करता है.

सांता क्लॉज के बिना क्रिसमस की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

सांता क्लॉस कैसा दिखता है? What does Santa Claus look like?

सांता को आमतौर पर एक सफेद दाढ़ी वाले गोल-मटोल, हंसमुख, व्यक्ति के रूप में दर्शाया जाता है.

सांता लाल रंग का पोशाख पहने हुए होते है, उनका लाल रंग का कोट सफेद फर के कॉलर और कफ से बना होता है तथा पतलून और टोपी पर भी सफेद फर की कारीगिरी होती है. उनकी बेल्ट और जूते काले चमड़े के बने होते हैं.

उनकी पीठ पर बच्चों के लिए उपहारों से भरा एक बड़ा सा थैला भी होता है. सांता को अक्सर चश्मे के साथ भी दर्शाया जाता है.

बच्चे साल भर सांता क्लॉज का इंतजार करते हैं. क्योंकि बच्चों को पूरा विश्वास होता है कि क्रिसमस के पावन अवसर पर उनके प्यारे सांता अंकल आएंगे और उन्हें ढेर सारी चॉकलेट और उपहार देंगे.

असल जिंदगी में असली सांता क्लॉज कौन थे? Who was the real Santa Claus in real life?

सांता क्लॉज का चरित्र सैकड़ों साल पहले जन्मे सेंट निकोलस (Saint Nicholas) नाम के एक साधु से जुड़ा है. 

आज से डेढ़ हजार साल पहले तुर्की के मीरा शहर के बिशप रहे संत निकोलस को ही असली सांता और सांता का जनक भी माना जाता है.

दरअसल, संत निकोलस का भी बच्चों से विशेष लगाव था और वह बच्चों को कुकीज़ और उपहार देते थे और उस समय संत निकोलस के प्रति लोगों के मन में बहुत सम्मान था.

हालांकि संत निकोलस और जीसस के जन्म के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन फिर भी सांता क्लॉज आज के समय में क्रिसमस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसके बिना क्रिसमस का त्योहार अधूरा है.

ईसाई दार्शनिकों और विद्वानों के अनुसार, संत निकोलस का जन्म ईसा की मृत्यु के 280 साल बाद तीसरी शताब्दी में आधुनिक तुर्की में मायरा के निकट पतारा में हुआ था और वे एक खुशहाल और समृद्ध परिवार से थे.

संत निकोलस ने विरासत में मिली अपनी सारी संपत्ति को दान कर दिया था और वह अक्सर गरीबों और बीमारों की मदद करते हुए ग्रामीण इलाकों की यात्रा किया करते थे. 

उनके बारे में कहा जाता है कि सेंट निकोलस ने बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया था. बचपन से ही उन्हें प्रभु यीशु मसीह में गहरी आस्था थी और इस वजह से वे बड़े होकर ईसाई धर्म के पादरी और बाद में बिशप बने.

आपको बता दें कि संत निकोलस ज्यादातर आधी रात को उपहार देते थे क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि कोई उन्हें उपहार देते हुए देखे, यानी वह बच्चों को बिना किसी दिखावे के चुपचाप तरीके से उपहार देना पसंद करते थे.

इसलिए आपने अक्सर अपने माता-पिता को यह कहते सुना होगा कि अगर आपको जल्दी नींद नहीं आई तो सांता क्लॉज तुम्हें उपहार देने नहीं आएंगे.

अपने उदार कार्यों के कारण, संत निकोलस अपने कार्यों के लिए लोकप्रिय हो गए और बच्चों के रक्षक के रूप में जाने गए.

यूरोप और दुनिया भर में, उनकी मृत्यु के दिन, 6 दिसंबर को संत निकोलस दिवस (Saint Nicholas Day) ​​के रूप में मनाया जाता है.

सांता क्लॉज़ कहां रहते है और उनका पता क्या है? Where does Santa Claus live and what is his address?

इसे चाहे लोगों की आस्था या एक तरह का अंधविश्वास समझा जाए, लेकिन सांता क्लॉज के पते के बारे में कहा जाता है कि सांता उत्तरी ध्रुव (North Pole) में अपनी पत्नी और कई बौनों (Dwarves) के साथ रहते है.

वह लैपलैंड (Lapland) नामक एक बर्फीले, हिरन से भरे वंडरलैंड में रहते है. यहीं पर वह हिरणों को प्रशिक्षित करते है और अपनी बेपहियों की गाड़ी से बर्फीले मैदानों में यात्रा करते है.

किवदंती यह भी है कि यहां एक खिलौने की फैक्ट्री है जहां कई तरह के खिलौने बनाए जाते हैं. कल्पित बौने क्रिसमस के खिलौने बनाने के लिए इस कारखाने में साल भर काम करते हैं.

आपको यह भी बता दें कि सांता के दुनिया भर में कई पते हैं, जहां बच्चे अपने पत्र भेजते हैं, लेकिन ज्यादातर पत्र फिनलैंड में उनके पते पर भेजे जाते हैं. दिलचस्प बात तो यह है कि लोगों को इस पते पर भेजे गए हर पत्र का जवाब भी मिलता है.

अगर आप भी संता को पत्र लिखना चाहते हैं तो नीचे दिए गए पते पर भेज सकते हैं.

Santa Claus, 

Santa Claus’s Main Post Office, 

96930 Napapiiri, 

Finland.

जबकि कई जगहों पर सांता के डाक स्वयंसेवक (Postal volunteers) होते हैं, जो सांता के नाम से इन पत्रों का जवाब देते हैं.

आज के इस तकनीकी और आधुनिक युग में देश-विदेश के कई बच्चे संता को चिट्ठी की जगह ई-मेल भेजते हैं, जिसका जवाब भी उन्हें मिलता है. वहीं क्रिसमस के दिन उनकी मनोकामना भी पूरी होती है.

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