दक्षिणा, इनाम और आदर-सम्मान में दिए जाने वाली धनराशि 11, 51, 101 जैसे रकम में क्यों दी जाती है? Why is the amount given in an odd figure for Dakshina, Prize, etc?

Why is the amount given in an odd figure for Dakshina, Prize, etc? दक्षिणा, इनाम और आदर-सम्मान में दिए जाने वाली धनराशि 11, 51, 101 जैसे रकम में क्यों दी जाती है?

नकद उपहार देते समय अतिरिक्त एक रुपया क्यों दिया जाता है? While gifting cash why do we add that extra one rupee?

हमारी भारतीय संस्कृति में कई रीति-रिवाज, परंपरा और त्योहार मनाये जाते हैं, जिनका लोग वर्षों से कठोरता से पालन कर रहे हैं, लेकिन कई लोग यह भी नहीं जानते हैं कि हम उनका पालन क्यों करते हैं. इन प्रथाओं में से एक रुपये की धनराशि में दक्षिणा, इनाम और आदर-सम्मान देना है; जिसे 51, 101, 501 के रूप में दिया जाता है. प्रशंसा के रूप में, धार्मिक गतिविधियों में या पुरस्कार के रूप में जो नकद दिया जाता है, तो यह हमेशा सम संख्या में 1 रुपया मिलाकर वह राशि विषम करके ही अदा की जाती है. आइए आज इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.

निर्धारित राशि से थोड़ा अधिक भुगतान करने से प्राप्तकर्ता खुश हो जाता है. देश के कई हिस्सों में आम, काजू ई. सौ (100) की संख्या में खरीदे जाते थे, उनमें से 100 की गिनती करते हुए, कम से कम 5 और अतिरिक्त फल दिए जाते थे. जब एक मापने वाले सेर (अनाज मापने का कप) के साथ अनाज की माप की जाती है, तो पहले सेर को भगवान के लिए भुगतान किया जाता था और अंतिम पांच सेर को अतिरिक्त दिया जाता था. एक बार यूरोप में, एक बेकर ने गलती से 12 के बजाय 13 चीजों को एक दर्जन के रूप में दिया था, इसलिए वहां 13 चीजों को बेकर्स डज़न (Baker’s Dozen) कहा जाता है.

विषम-राशि की पेशकश के पीछे एक भावना यह है कि ‘सम’ संख्याओं को विभाजित किया जा सकता है, लेकिन ‘विषम’ संख्याओं को विभाजित नहीं किया जा सकता है. उसी तरह, प्राप्त कर्ता का आनंद और खुशी कभी भी विभाजित नहीं होनी चाहिए और अतिरिक्त 1 रुपया वृद्धि का संकेत माना जाता है, अर्थात हमेशा वृद्धि होती रहे.

इसके अलावा 50, 100, 500 जैसे सम संख्या के अंत में शून्य आता है और शून्य का अर्थ है… यह सब खत्म हो गया! ताकि ऐसा न हो, इसी लिए अतिरिक्त 1 रुपये का भुगतान किया जाता है. अगला अतिरिक्त 1 रुपया, अर्थात्, सद्भावना जो दर्शाती है की उससे आगे भी गिनती जारी है.

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‘अधिकस्य अधिकं फलम्’; आज, वास्तव में, 1 रुपये का कोई मूल्य नहीं है. सरकार को एक रुपये के नोट को छापने में 1 रुपये से अधिक का खर्च आता है. हालांकि, सरकार अभी भी 1 रुपए के नोटों को छापती है, इसके पीछे का कारण लोगों की भावना हो सकती है. 

पुराने समय में, दैवी अनुष्ठान करने वाले पुरोहितों को धार्मिक उद्देश्यों के लिए सवा रुपए दक्षिणा दी जाती थी. इससे पहले दक्षिणा में केवल चांदी का रुपया उपहार दिया जाता था. यह दक्षिणा, एक प्रतीक के रूप में और फल, राशन, नारियल के अलावा शुद्ध धातु के उपहार के रूप में दी जाती थी. यदि किसी कारणवश पूजा सामग्री एकत्र करना मेजबान के लिए कठिन हो जाता था, तो पुरोहितजी को सामग्री के लिए सवा रुपए और दक्षिणा के सवा रुपए ऐसे कुल मिलाकर ढाई रुपए दिए जाते थे. 

यहां बताने के लिए एक मजेदार कहानी है. 1918 में, ब्रिटिश सरकार ने भारत में ढाई रुपए (2 रुपए 8 आना) का एक अजीब मुद्रा नोट छापा था. कागज का नोट आने पर परेशानी का सामना करना पड़ा; क्योंकि, दक्षिणा देते समय उस पर तुलसी के पत्ते रखकर, जल प्रवाहित किया जाता था. तुलसी के पत्तों को दक्षिणा पर रखने और जल प्रवाह बनाने का अर्थ है, सब कुछ समर्पण करने की भावना होती है. तो अब समस्या यह थी कि कागज के नोट पर पानी का प्रवाह कैसे किया जाए? इसलिए नोट पर एक सिक्का रखकर उस पर जल प्रवाहित करने का रिवाज बन गया.

इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि बहुत से लोग नहीं जानते हैं की बहुत से धार्मिक स्थल या बहुत जानकार पुरोहित आपके पास से लिए गए दक्षिणा में से 1 रुपए वापस करते हैं. उस रुपये को शुभ शगुन, भगवान का उपहार माना जाता है. इसके अलावा, भले ही दान देने वाला आपकी झोली में सब कुछ डाल दे, तो भी इसे स्वीकार करके आपको उसे दिवालिया नहीं बनाना चाहिए. इसलिए प्रसाद के रूप में कुछ धन उसे वापस किया जाना चाहिए. अब इस प्रथा का पालन केवल कुछ विशेषज्ञों द्वारा ही किया जाता है.

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कुछ स्थानों पर, यह माना जाता है कि दान में शीर्ष 1 रुपया पुजारी के लिए है और बाकी मंदिर के लिए है. घर में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद 12वें या 13वें दिन, घर के लोग सभी धार्मिक गतिविधियों को पूरा करने के बाद नए सिरे से मंदिर में जाते हैं. चूंकि उस समय, पुजारी द्वारा कोई धार्मिक कार्य करने का प्रयोजन नहीं होता है, इसलिए उन्हें सम राशि की दक्षिणा / दान दिया जाता है. इसलिए, सम राशि में भुगतान करना अशुभ माना जाता है.

आशा है कि अब जब आप किसी को 101 या 501 रुपये का भुगतान करेंगे, तो आप इन सभी बातों को निश्चित रूप से याद रखेंगे.

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श्री. मकरंद करंदीकर

श्री. मकरंद करंदीकर बैंक ऑफ इंडिया के सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं. मकरंदजी पिछले 50 से अधिक वर्षों से विभिन्न प्रकार के दीयों का संग्रह कर रहे हैं, जो भारतीय दीयों के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है. उनके व्यक्तिगत संग्रह में 1000 से अधिक दीए शामिल हैं. उनका यह संग्रह भारत में दीपों का सबसे बड़ा संग्रह है और इस रिकॉर्ड के लिए उनका नाम 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' और 'इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में दर्ज हो चुका है. इसके अलावा, उन्होंने सामाजिक, पारंपरिक रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक और ज्ञान-संबंधी लेखन के माध्यम से योगदान दिया है.

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