शीत युद्ध किसे कहते हैं? अर्थ, परिभाषा, कारण एवं परिणाम

Cold War Meaning History in Hindi

Sheet yudh kya hai? Cold War in Hindi – अगर हम इतिहास के सबसे लंबे युद्ध की बात करें तो “शीतयुद्ध (Cold War)” का नाम प्रमुखता से आता है। शीत युद्ध को “कूटनीतिक युद्ध (Diplomatic War)” के रूप में भी जाना जा सकता है, क्योंकि यह एक अप्रत्यक्ष या सीमित युद्ध था। यह एक अनोखा युद्ध था क्योंकि इसमें युद्ध से संबंधित बहुत कम सीनाजोरी हुई थी, लेकिन वैश्विक राजनीति और संघर्षों की दिशा पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण था।

यह युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के तुरंत बाद शुरू हुआ और 1990 के दशक में समाप्त हुआ। इस प्रकार, शीत युद्ध ने 20वीं शताब्दी के अधिकांश समय में वैश्विक राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को गहराई से प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप विश्व सामंजस्य, राजनीति और संघर्ष की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

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शीत युद्ध किसे कहते हैं? What is Cold War Called in Hindi?

“शीत युद्ध” को अंग्रेजी में “Cold War” कहा जाता है। अमेरिका और रूस (Russia) के बीच उत्पन्न तनाव की स्थिति को शीत युद्ध (Cold War) के नाम से जाना जाता है।

शीत युद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और उसके नाटो सहयोगियों (NATO allies) और सोवियत संघ (Soviet Russia) और उसके वारसॉ संधि सहयोगियों (Warsaw Pact allies) के बीच भूराजनीतिक तनाव और प्रतिस्पर्धा का काल था। यह संघर्ष कई दशकों तक चला, 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) की समाप्ति से लेकर 1990 के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ के विघटन तक।

हालाँकि इसे “युद्ध” कहा गया था, लेकिन इसमें दो महाशक्तियों के बीच सीधा सैन्य संघर्ष शामिल नहीं था। इसके बजाय, शीत युद्ध की विशेषता राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ हथियारों की दौड़ भी थी। दो मुख्य विचारधाराएँ लोकतंत्र और पूंजीवाद (Capitalism – संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रतिनिधित्व) बनाम साम्यवाद (Communism – सोवियत संघ द्वारा प्रतिनिधित्व) थीं। दोनों महाशक्तियाँ अक्सर दूसरे देशों में छद्म युद्धों (Proxy War) के माध्यम से दुनिया भर में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में लगी थीं।

शीतयुद्ध का अर्थ (Cold War Meaning in Hindi)

शीत युद्ध के नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें कोई वास्तविक युद्ध नहीं लड़ा जाता, बल्कि “शीतयुद्ध (Cold War)” का तात्पर्य दो देशों या संगठनों के बीच एक प्रकार के संघर्ष से है। शीत युद्ध का परिणाम आमने-सामने का सैन्य युद्ध नहीं होता, बल्कि आमतौर पर यह एक राजनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा होती है।

इस युद्ध के कारण हथियारों के बीच कोई सीधा संघर्ष नहीं होता है। यह अवस्था अक्सर दो विरोधी दलों या देशों के बीच सीमा विवाद या अलगाव के रूप में सामने आती है जिसके कारण दोनों पक्ष आपसी तनाव और नाराजगी की स्थिति में रहते हैं।

इसमें दो बड़े देशों, संघों या गठबंधनों के बीच विभिन्न हमलों और प्रतिक्रियाओं के बीच गेम थ्योरी, कूटनीति, आर्थिक दबाव और जासूसी शामिल है। इससे एक बड़े शांतिपूर्ण युद्ध के बजाय संघर्ष की ओर बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है, जिसमें सैन्य कार्रवाई के बजाय रणनीतिक और सामाजिक दबाव प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

“शीत युद्ध” शब्द आम तौर पर समय की एक विशिष्ट अवधि के लिए प्रयोग किया जाता है, जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच उत्पन्न संघर्ष या आर्थिक माहौल को कहा जाता है।

शीत युद्ध की उत्पत्ति (Origin of the Cold War in Hindi)

शीत युद्ध के लक्षण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दिखाई देने लगे जब दो महत्वपूर्ण महाशक्तियाँ, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ, अपने व्यक्तिगत हितों को ध्यान में रखते हुए युद्ध लड़ रहे थे और आपसी सहयोग की भावना का दिखावा कर रहे थे। इस युद्ध की शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच युद्ध नहीं हुआ था, बल्कि उनके बीच आपसी संघर्ष और तनाव बढ़ता जा रहा था। शीत युद्ध की उत्पत्ति के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

वैचारिक मतभेद: 

संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच मौलिक वैचारिक मतभेदों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संयुक्त राज्य अमेरिका ने लोकतंत्र, पूंजीवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया, जबकि सोवियत संघ ने साम्यवाद, सामूहिक स्वामित्व और एक नियोजित अर्थव्यवस्था की वकालत की। इन परस्पर विरोधी विचारधाराओं ने दोनों महाशक्तियों के बीच गहरी खाई पैदा कर दी।

वैश्विक प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा: 

संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दोनों द्वितीय विश्व युद्ध से महाशक्तियों के रूप में उभरे। प्रत्येक ने दुनिया भर में अपने प्रभाव का विस्तार करने और अपनी-अपनी विचारधाराओं को बढ़ावा देने की मांग की। वैश्विक प्रभुत्व की इस प्रतिस्पर्धा के कारण संघर्ष और तनाव पैदा हुए।

पूर्वी यूरोप पर असहमति: 

प्रारंभिक फ़्लैशप्वाइंट में से एक पूर्वी यूरोप का मुद्दा था। सोवियत संघ ने युद्ध के दौरान पूर्वी यूरोपीय देशों को नाजी कब्जे से मुक्त कराया और इन देशों में कम्युनिस्ट समर्थक सरकारें स्थापित कीं। अमेरिका ने इसे सोवियत प्रभाव के विस्तार के रूप में देखा, जिससे पूर्वी यूरोप में तनाव पैदा हो गया।

अविश्वास और ग़लतफ़हमी: 

दोनों महाशक्तियों के बीच आपसी अविश्वास और ग़लतफ़हमी ने भी एक भूमिका निभाई। किसी भी पक्ष ने दूसरे पर पूरा भरोसा नहीं किया और भरोसे की कमी के कारण हथियारों की होड़, जासूसी और निरंतर निगरानी शुरू हो गई।

परमाणु बम: 

संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा, विशेष रूप से जापान के विरुद्ध, परमाणु हथियारों के विकास और उपयोग ने असुरक्षा और तात्कालिकता की भावना को बढ़ा दिया। 1949 में सोवियत संघ द्वारा अपने परमाणु बम के सफल परीक्षण ने शीत युद्ध में एक नया आयाम जोड़ा, जिससे हथियारों की होड़ शुरू हो गई।

सैन्य गठबंधनों का गठन: 

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1949 में नाटो (NATO – North Atlantic Treaty Organization) की स्थापना की, और सोवियत संघ ने 1955 में वारसॉ संधि (Warsaw Pact) बनाकर जवाब दिया। इन सैन्य गठबंधनों ने यूरोप में विभाजन को गहरा कर दिया।

आर्थिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा: 

दो महाशक्तियाँ हथियारों की होड़ में लगी हुई हैं, परमाणु हथियारों के विशाल शस्त्रागार का निर्माण कर रही हैं। उन्होंने वैश्विक स्तर पर आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से भी प्रतिस्पर्धा की, जिससे प्रतिद्वंद्विता और भी तीव्र हो गई।

संकट की घटनाएँ: 

बर्लिन नाकाबंदी (Berlin Blockade), कोरियाई युद्ध और क्यूबा मिसाइल संकट जैसी कई संकट की घटनाओं ने संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ को सीधे संघर्ष के कगार पर ला दिया और तनाव बढ़ा दिया।

शीत युद्ध की विशेषता दो महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की कमी थी, लेकिन इसे छद्म युद्ध, जासूसी और निरंतर सतर्कता की स्थिति द्वारा चिह्नित किया गया था। इसका वैश्विक राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा और 20वीं शताब्दी के अधिकांश समय में इसने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को आकार दिया। शीत युद्ध अंततः 1990 के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ के विघटन के साथ समाप्त हुआ।

शीत युद्ध के चरण (Stages of Cold War)

शीत युद्ध के इतिहास को कई चरणों में विभाजित किया जा सकता है, जिसमें विभिन्न घटनाएँ और घटनाक्रम शामिल हैं। 

प्रारंभिक चरण (1945-1947): 

शीत युद्ध का पहला चरण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ, जब संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच आपसी सहयोग की भावना पैदा हुई। लेकिन अलग-अलग विचारधाराओं और आपसी अविश्वास के कारण संघर्ष शुरू हो गया। इस चरण में बर्लिन नाकाबंदी (Berlin Blockade – 1948-1949) और तुर्की पर सोवियत कब्जे के खिलाफ मार्शल योजना (Marshall Plan) भी शामिल थी।

एक रोकथाम गठबंधन (1947-1953): 

इस चरण में, शीत युद्ध के परिणामस्वरूप एक रोकथाम नीति बनी, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका एक रोकथाम नीति (Containment Policy) की ओर बढ़ गया और, तंत्र की एक प्रक्रिया के माध्यम से, प्रभाव को रोकने की कोशिश की। इस समय के दौरान, नाटो (North Atlantic Treaty Organization) और वारसॉ संघ (Warsaw Union) की स्थापना की गई।

सूचना और अंतर्राष्ट्रीय दिशा (1953-1962): 

इस चरण में, परमाणु शक्ति (Nuclear Energy) के प्रतिस्पर्धी उदय के साथ शीत युद्ध ने एक नया रूप ले लिया। इसके प्रमुख घटनाक्रमों में Hungarian Crisis (1956) और Cuban Missile Crisis (1962) शामिल हैं।

समृद्धि और सुसमाचार (1963-1979): 

इस चरण ने शीत युद्ध के प्रचार अभियान की शुरुआत को चिह्नित किया, क्योंकि दोनों पक्षों ने सुसमाचार के माध्यम से संघर्ष को कम करने का प्रयास किया। इसके परिणामस्वरूप Hotel Transiva (1975) और परमाणु हथियारों की सीमा बनाने वाले समझौते के बीच कम संघर्ष हुआ।

अंत (1980-1991): 

शीत युद्ध तब समाप्त हुआ जब सोवियत संघ का अस्तित्व समाप्त हो गया। मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा पेरेस्त्रोइका (Perestroika) और ग्लासनोस्ट (Glasnost की शुरूआत के साथ, सोवियत संघ की सैन्य प्रणाली कमजोर हो गई, जिसके परिणामस्वरूप शीत युद्ध का अंत हुआ।

ये शीत युद्ध के प्रमुख चरण थे, जो दो महाशक्तियों के बीच दशकों तक चले और वैश्विक इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े रहे।

शीत युद्ध के परिणाम (Consequences of the World War)

  • शीत युद्ध ने दुनिया को दो महत्वपूर्ण महाशक्तियाँ, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ बनाने में मदद की। इसने दोनों देशों को आपसी संघर्ष की ओर मोड़ दिया, जिसका प्रभाव पूरी दिनिया पर पड़ा।
  • शीत युद्ध ने आर्थिक स्वायत्तता और वैश्विक स्थिरता की दिशा में नई परियोजनाएँ शुरू कीं। इससे दोनों महाशक्तियों को आर्थिक साथियों के रूप में संबोधित करने में मदद मिली, जो उनके संघर्ष के बावजूद संभव था।
  • जुझारू लोगों की संख्या में वृद्धि के बावजूद, कई संवैधानिक आपसी समझौते हुए, जैसे कि सीमा समझौता (SALT) और START समझौता, जो परमाणु हथियारों पर बंधन निर्धारित करते हैं।
  • शीत युद्ध ने उपग्रह संचार और इलेक्ट्रॉनिक महत्ता के विकास और प्रक्षेपण में मदद की। इससे परमाणु उपग्रहों और जासूसी के विकास और उपयोग को बढ़ावा मिला।
  • अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने अपनी अटकलों का समर्थन करने के लिए अन्य देशों को सभी प्रकार की सेना और युद्ध सामग्री प्रदान की।
  • शीत युद्ध का राजनीति, विदेशी संघर्षों और दुनिया भर में संघर्षों के नियमन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिणाम हुए।
  • शीत युद्ध के परिणामस्वरूप सोवियत संघ का अस्तित्व समाप्त हो गया। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और यूरोप के कई देश स्वतंत्र हो गये।
  • शीत युद्ध के परिणामस्वरूप, संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूरोप, एशिया और अन्य जगहों पर आपसी सहयोग और संबंध विकसित करते हुए, शेष विश्व पर अपनी शक्ति का तेजी से प्रदर्शन किया।
  • शीत युद्ध ने दुनिया को परमाणु युद्ध के खतरे के प्रति सचेत रखा। इसने परमाणु हथियारों और परमाणु हथियारों और उनके परमाणु हथियारों की निगरानी और बातचीत के प्रयासों को प्रेरित किया।
  • शीत युद्ध ने कई आर्थिक और कानूनी मुद्दे उत्पन्न किए, जैसे तुर्की का क्यूबा मिसाइल संकट, बर्लिन नाकाबंदी और उपग्रह यातायात मुद्दे।
  • शीत युद्ध ने संवैधानिक आपसी समझौतों की अनुमति दी, जिसने परमाणु हथियारों पर सीमाएं तय कीं, साथ ही दुनिया भर में परमाणु स्वायत्तता और नीति को व्यापक रूप से प्रभावित किया।
  • इन परिणामों के साथ, शीत युद्ध ने वैश्विक राजनीति, सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों की दिशा के लिए महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न किए और इसने 20वीं शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की दिशा को प्रभावित किया।

शीत युद्ध के फायदे (Benefits of Cold War)

शीत युद्ध, तनाव और प्रतिद्वंद्विता की विशेषता होने के बावजूद, दुनिया के लिए कुछ अप्रत्यक्ष लाभ थे। 

  • तकनीकी प्रगति: संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रतिस्पर्धा से महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति हुई, विशेष रूप से अंतरिक्ष अन्वेषण, परमाणु प्रौद्योगिकी और सैन्य हार्डवेयर के क्षेत्र में।
  • अंतरिक्ष दौड़: शीत युद्ध ने अंतरिक्ष दौड़ को बढ़ावा दिया, जिसके कारण चंद्रमा पर लैंडिंग जैसी उपलब्धियां हासिल हुईं, जिससे अंतरिक्ष और विज्ञान के बारे में हमारी समझ उन्नत हुई।
  • परमाणु निरोध: परमाणु क्षमताओं वाली दो महाशक्तियों की उपस्थिति ने बड़े पैमाने पर सैन्य संघर्षों के खिलाफ एक निवारक के रूप में काम किया, जिससे सीधे तौर पर तीसरे विश्व युद्ध को रोका गया।
  • आर्थिक विकास: दोनों महाशक्तियों ने रक्षा और बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया, जिसने उनके संबंधित देशों में आर्थिक विकास और रोजगार सृजन में योगदान दिया।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान: सैन्य वर्चस्व की खोज से वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए धन में वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप चिकित्सा और कंप्यूटर प्रौद्योगिकी सहित विभिन्न क्षेत्रों में सफलताएँ मिलीं।
  • वैश्विक गठबंधन: शीत युद्ध ने नाटो और वारसॉ संधि जैसे गठबंधनों के गठन को प्रेरित किया, जिससे सदस्य देशों के बीच सुरक्षा और सहयोग बढ़ा।
  • विउपनिवेशीकरण: शीत युद्ध के युग में सहयोगियों को प्राप्त करने पर महाशक्तियों के ध्यान ने अप्रत्यक्ष रूप से कई देशों के विउपनिवेशीकरण प्रयासों का समर्थन किया, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में औपनिवेशिक शासन का अंत हुआ।
  • मानवाधिकार जागरूकता: शीत युद्ध ने मानवाधिकार के मुद्दों के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ा दी, क्योंकि दोनों महाशक्तियों ने प्रचार के लिए मानवाधिकारों को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे दुनिया भर में मानवाधिकारों के हनन की जांच बढ़ गई।
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान: राजनीतिक तनावों के बावजूद, पूर्व और पश्चिम के बीच कुछ हद तक सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ, जिससे लोगों को एक-दूसरे की संस्कृतियों के बारे में जानने और उनकी सराहना करने का मौका मिला।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: सीधे संघर्ष से बचने की इच्छा के कारण कूटनीति और अंतर्राष्ट्रीय वार्ता में वृद्धि हुई, जिसने भविष्य के राजनयिक प्रयासों के लिए आधार तैयार किया।
  • छद्म युद्ध: जबकि छद्म युद्धों ने महत्वपूर्ण पीड़ा पहुंचाई, उन्होंने महाशक्तियों को सीधे टकराव और उनके बीच पूर्ण युद्ध के परिणामस्वरूप होने वाली संभावित तबाही से भी बचाया।
  • परमाणु हथियार नियंत्रण: शीत युद्ध के कारण अंततः सामरिक हथियार सीमा वार्ता (एसएएलटी) और इंटरमीडिएट-रेंज परमाणु बल संधि (आईएनएफ) जैसे हथियार नियंत्रण समझौते हुए, जिससे परमाणु हथियारों की संख्या कम हो गई।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये लाभ अक्सर शीत युद्ध के अप्रत्यक्ष या अनपेक्षित परिणाम थे, और उन्हें इस अवधि के दौरान हुए नकारात्मक पहलुओं और संघर्षों पर हावी नहीं होना चाहिए।

शीत युद्ध के नुकसान (Disadvantages of Cold War)

कुछ अप्रत्यक्ष लाभों के बावजूद, शीत युद्ध के कई नुकसान और नकारात्मक परिणाम भी थे। 

  • हथियारों की दौड़: शीत युद्ध ने हथियारों, विशेष रूप से परमाणु हथियारों की तीव्र दौड़ शुरू कर दी, जिसने विशाल संसाधनों का उपभोग किया और वैश्विक विनाश का लगातार खतरा पैदा किया।
  • छद्म युद्ध: महाशक्तियाँ विभिन्न क्षेत्रों में छद्म युद्धों में लगी हुई हैं, जिससे अत्यधिक मानवीय पीड़ा हो रही है और कोरियाई युद्ध और वियतनाम युद्ध जैसे पूरे देश अस्थिर हो रहे हैं।
  • सैन्य संघर्ष: तनाव और प्रतिद्वंद्विता के कारण सैन्य संघर्ष हुआ, जिसमें क्यूबा मिसाइल संकट भी शामिल था, जिसने दुनिया को विनाशकारी परमाणु युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया।
  • विभाजित राष्ट्र: कई राष्ट्र वैचारिक आधार पर विभाजित हो गए, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी राजनीतिक और सामाजिक विभाजन हुए, जैसे उत्तर और दक्षिण कोरिया और पूर्व और पश्चिम जर्मनी के बीच विभाजन।
  • आर्थिक बोझ: उच्च सैन्य व्यय ने दोनों महाशक्तियों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाला, जिससे संसाधनों को स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और बुनियादी ढांचे जैसे अन्य आवश्यक क्षेत्रों से हटा दिया गया।
  • दमन और निगरानी: शीत युद्ध के युग में दोनों महाशक्तियों में व्यापक राज्य निगरानी और नागरिक स्वतंत्रता का दमन देखा गया, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता का उल्लंघन हुआ।
  • परमाणु प्रसार: महाशक्तियों के परमाणु शस्त्रागार ने अन्य देशों को अपनी परमाणु क्षमताओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया, जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार में योगदान हुआ।
  • वैश्विक तनाव: शीत युद्ध का प्रभाव विभिन्न वैश्विक क्षेत्रों तक फैल गया, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहा, विशेष रूप से मध्य पूर्व में, जहां महाशक्तियों के हित टकराए।
  • मानवाधिकारों का उल्लंघन: दोनों महाशक्तियों ने सत्तावादी शासन का समर्थन किया और अपने सहयोगियों में मानवाधिकारों के हनन को नजरअंदाज किया, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में पीड़ा हुई।
  • सांस्कृतिक विभाजन: वैचारिक प्रतिद्वंद्विता ने सांस्कृतिक विभाजन को जन्म दिया, आयरन कर्टन ने पूर्वी और पश्चिमी यूरोप को अलग कर दिया, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान और संचार सीमित हो गया।
  • प्रचार और गलत सूचना: दोनों महाशक्तियाँ व्यापक प्रचार प्रयासों में लगी हुई हैं, जिससे बड़े पैमाने पर गलत सूचना और जनता की राय में हेराफेरी हो रही है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: शीत युद्ध के दौरान सैन्य और औद्योगिक प्रभुत्व की खोज के परिणामस्वरूप परमाणु परीक्षण और प्रदूषण सहित महत्वपूर्ण पर्यावरणीय क्षति हुई।
  • परमाणु जोखिम: परमाणु युद्ध के निरंतर खतरे और दुर्घटनाओं या ग़लत अनुमानों की संभावना ने मानवता के अस्तित्व के बारे में चिंताएँ बढ़ा दी हैं।

शीत युद्ध के ये नुकसान वैश्विक और क्षेत्रीय दोनों स्तरों पर संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रतिद्वंद्विता के नकारात्मक प्रभाव को उजागर करते हैं।

निष्कर्ष (Final Words): Sheet yudh kya hai?

“शीत युद्ध (Cold War)” शब्द इस तथ्य को संदर्भित करता है कि अमेरिका और यूएसएसआर के बीच तनाव और शत्रुता कभी भी दोनों देशों के बीच खुले युद्ध में नहीं बढ़ी। महाशक्तियाँ, अपने सहयोगियों के साथ, “ठंडे” या गैर-शूटिंग युद्ध में लगी हुई थीं, जिससे दुनिया को परमाणु संघर्ष का लगातार खतरा बना हुआ था। 20वीं सदी के दौरान शीत युद्ध का अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वैश्विक राजनीति, सैन्य रणनीतियों और गठबंधनों को आकार देने पर गहरा प्रभाव पड़ा।

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