महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है? महाशिवरात्रि का क्या महत्व है? Mahashivratri in Hindi

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Mahashivratri in Hindi – दोस्तों क्या आप जानते हैं कि शिवरात्रि हर महीने आती है लेकिन महाशिवरात्रि साल में एक बार ही आती है। हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व (Mahashivratri festival) मनाया जाता है।

आज के लेख में हम भारत के इसी पावन पर्व महाशिवरात्रि के बारे में जानेंगे कि आखिर महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है? महाशिवरात्रि मनाने का क्या महत्व है? और महाशिवरात्रि की कथा क्या है?

महाशिवरात्रि के पर्व पर भगवान शिव से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। आज यहां आपको उन्हीं में से कुछ पौराणिक कथाओं के बारे में जानने को मिलेगा, तो आप इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है? Mahashivratri in Hindi

वैसे तो एक वर्ष में 12 शिवरात्रि आती हैं, जो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ती हैं, जिनमें से माघ के महीने में आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है और लोग इसे बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं।

भगवान शिव का अर्थ कल्याण है अर्थात शिव ही कल्याणकारी हैं। पुराणों और शास्त्रों में भगवान शिव को महादेव कहा गया है क्योंकि महादेव सृष्टि के समस्त प्राणियों के स्वामी हैं। भगवान शिव की कृपा से ही समस्त पृथ्वी में अनुशासन और प्रेम भक्ति का संचार होता है।

महाशिवरात्रि हर साल पूरे भारत में मनाई जाती है और हर कोई बहुत भक्तिभाव और उत्साह के साथ भगवान शिव की पूजा करता है। महाशिवरात्रि का यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है।

भगवान शिव के भक्त और श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और पास के शिव मंदिर में जाते हैं और वहां शिवलिंग पर बेलपत्र, फूल आदि चढ़ाते हैं और शिवलिंग पर दूध का अभिषेक भी करते हैं।

इस पर्व के महत्व के बारे में कहा जाता है कि जो कोई भी इस दिन भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करता है, भगवान शिव उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं।

यह तो हुई महा शिवरात्रि मनाने से सम्बंधित जानकारी, लेकिन क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि इस दिन को महा शिवरात्रि क्यों कहा जाता है, इसका क्या महत्व है?

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महाशिवरात्रि मनाने का क्या महत्व है?

ब्रह्मांड में एक अंतर्निहित शक्ति निरंतर प्रवाहित हो रही है, एक रहस्यमयी ऊर्जा जो पूरे ब्रह्मांड को चलायमान रखती है। वैज्ञानिक अभी तक इस शक्ति को समझ नहीं पाए हैं और न ही इसे कोई नाम दे पाए हैं। यद्यपि भारत के प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने इस अज्ञात शक्ति को “शिव (Shiva)” के रूप में संदर्भित किया है।

शिव ब्रह्मांड की वो अदृश्य ऊर्जा है जो हर जीव के भीतर मौजूद है। इसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा के कारण ही हम अपने दैनिक क्रियाकलाप जैसे सांस लेना, खाना-पीना, चलना-फिरना तथा अन्य शारीरिक क्रियाएं कर पाते हैं।

यह ऊर्जा न केवल जीवित प्राणियों को चलायमान रखती है, बल्कि यह निर्जीव वस्तुओं पर भी कार्य करती है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के हर तत्व के अस्तित्व को नियंत्रित करते हैं।

आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा की जाती है, जिससे भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं।

शिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व:

शिवरात्रि के दिन शिव भक्त सुबह से शाम तक भगवान शिव का ध्यान करते हैं, जिससे उनके भीतर आध्यात्मिक शक्ति प्रकट होती है और प्रकाश पुंज दिखाई देता है। जब व्यक्ति अपने स्वभाव को भूलकर भगवान शिव का ध्यान करता है तो उसे एक ऐसी ऊर्जा का अनुभव होता है जो उसे आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है। इस शक्ति से युक्त व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

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महाशिवरात्रि मनाने का वैज्ञानिक महत्व:

वैज्ञानिक महत्व की बात करें तो इस रात को ग्रह (पृथ्वी) का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार स्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की प्राकृतिक ऊर्जा ऊपर की ओर जाती है। यह एक खगोलीय दिन है जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक पहुंचने में मदद करती है।

शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा करने के लिए व्यक्ति को ऊर्जा कुंज के साथ सीधे बैठना होता है, जिससे रीड की हड्डी मजबूत होती है और व्यक्ति को एक अलौकिक शक्ति का अहसास होता है।

महाशिवरात्रि पर शिव और शक्ति का मिलन होता है

महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए भी माना जाता है क्योंकि यह शिव और शक्ति के मिलन की रात है। आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और मनुष्य के मिलन की रात कहा जाता है।

महाशिवरात्रि पर, शिव के भक्त पूरी रात अपने आराध्य देवता का ध्यान करते हुए जागते रहते हैं। शिव भक्त इस दिन भगवान शिव का विवाहोत्सव मनाते हैं। 

ऐसा माना जाता है कि शक्ति स्वरूपा देवी पार्वती (Parvati) का विवाह महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव से हुआ था। इस दिन भगवान शिव ने वैराग्य का जीवन त्याग कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था।

माना जाता है कि शिवरात्रि के 15 दिन बाद होली का त्योहार (Holi festival) मनाने के पीछे यह भी एक कारण है की शिव, जो वैरागी थे, गृहस्थ हो गए थे।

महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा – Maha Shivaratri story in Hindi

महाशिवरात्रि से जुड़ी कई कथाएं शास्त्रों और अलग-अलग पुराणों में बहुत प्रचलित हैं। भागवत पुराण (Bhagavata Purana) के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन (Samudra Manthan) में बहुमूल्य वस्तुएं निकलीं जिन्हें देवताओं और असुरों ने बांट लिया। लेकिन जब समुद्र मंथन से हलाहल (Halahal) नाम का विष निकला तो कोई भी उस विष को ग्रहण करने को तैयार नहीं हुआ।

वह विष समुद्र में फैलने लगा और उसके प्रभाव से समुद्री जीवों पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। इस भयानक आपदा को देखकर सभी देवगण और महर्षि गण भगवान शिव के पास गए और भगवान शिव से जीवित प्रकृति को बचाने की प्रार्थना करने लगे।

भगवान शिव बहुत ही दयालु और भोले हैं, वे ब्रह्मांड को बचाने के लिए तुरंत तैयार हो गए और विष पीने के बाद उन्होंने अपनी योग शक्ति से विष को अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया था, जिसके कारण भगवान शिव को नीलकंठ (Neelkanth) के नाम से जाना जाने लगा।

शिव जी के इस त्याग से संसार के प्राण बच गए और सारी रात देवताओं ने शिव जी के इस कार्य का गुणगान किया और उन्हें देवों के देव महादेव (Mahadev) भी कहा। इसलिए हम भगवान शिव को महादेव भी कहते हैं।

इसी तरह शिवरात्रि का अर्थ है भगवान शिव की याद में बिताई गई रात। इसे महाशिवरात्रि के रूप में जाना जाता है और बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

एक और किंवदंती है कि जब देवी गंगा पूरे उफान पर पृथ्वी पर उतर रही थीं, तब भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर लिया, और इस प्रकार पृथ्वी को विनाश से बचाया। इसलिए भी इस दिन को शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है और इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक भी किया जाता है।

शिवजी पहली बार महाशिवरात्रि पर प्रकट हुए थे

शिव पुराण (Shiva Purana) की कथाओं के अनुसार भगवान शिव सर्वप्रथम महाशिवरात्रि के दिन ब्रह्मांड में प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य अग्नि के शिवलिंग में ज्योतिर्लिंग (Jyotirlinga) के रूप में था। एक ऐसा शिवलिंग जिसका न आदि (Beginning) था न अंत (End)

पौराणिक कथा के अनुसार शिवलिंग (Shivling) का पता लगाने के लिए हंस रूपी ब्रह्माजी (Lord Brahma) शिवलिंग के सबसे ऊपरी हिस्से को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी हिस्से तक पहुंच ही नहीं सकें।

दूसरी ओर भगवान विष्णु (Lord Vishnu) भी वराह का रूप धारण कर शिवलिंग का आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला।

64 जगहों पर प्रकट हुए थे शिवलिंग 

एक और कथा है कि महाशिवरात्रि के दिन 64 अलग-अलग जगहों पर शिवलिंग प्रकट हुए थे। उनमें से हम केवल 12 स्थानों का नाम जानते हैं जिन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंगों (12 Jyotirlingas) के नाम से जानते हैं।

महाशिवरात्रि के दिन लोग उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर (Mahakaleshwar Temple) में दीपस्तंभ लगाते हैं। दीपस्तंभ इसलिए लगाए जाते हैं ताकि लोग भगवान शिव के शाश्वत लिंग का अनुभव कर सकें।

यहां की मूर्ति का नाम लिंगोद्भव (Lingodbhava) है, अर्थात जो लिंग से प्रकट हुआ, ऐसा लिंग जिसका न आदि था और न अंत।

महाशिवरात्रि पर क्या करें?

शिव भक्तों को यह भी जानना चाहिए कि महाशिवरात्रि के दिन क्या करना चाहिए? दरअसल महाशिवरात्रि वह दिन है जब हम भगवान शिव की विशेष अराधना की जाती हैं। महाशिवरात्रि के दिन ज्यादातर लोग ध्यान, मंत्रोच्चारण, शिव की पूजा और शिव के भजन गाकर इस पर्व को मनाते हैं। आप इनमें से किसी भी भक्तिरस में भाग ले सकते हैं:

  • उपवास: व्रत करने से शरीर से हानिकारक तत्व बाहर निकल जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है, जिससे मन को शांति मिलती है और शरीर तरोताजा महसूस करता है। जब मन शांत और स्थिर होता है, तो वह आसानी से ध्यान में चला जाता है। इसलिए महाशिवरात्रि का व्रत करने से मन और मस्तिष्क को शांति मिलती है।
  • ध्यान: खगोलशास्त्र के अनुसार महाशिवरात्रि की रात नक्षत्रों की स्थिति साधना के लिए बहुत शुभ मानी जाती है। इसलिए साधकों को सलाह दी जाती है कि वे महाशिवरात्रि की रात जागकर ध्यान करें।
  • जप / मंत्रोच्चारण: महाशिवरात्रि के दिन “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का निरंतर जाप सबसे अधिक लाभकारी होता है। यह मंत्र तुरंत आपकी ऊर्जा को बढ़ाता है।

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