रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई? How did Rudraksha originate?

How did Rudraksha originate? रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई?

Rudraksha story in Hindi – पुराणों में ‘रुद्राक्ष’ (Rudraksha) को भगवान ‘शिव’ का रूप माना गया है. किंवदंतियों के अनुसार, भगवान शिव ने इन दिव्य मनकों (रुद्राक्ष) का वरदान मनुष्यों को उनके पापों से मुक्त करने के लिए दिया था. मान्यता है कि रुद्राक्ष को धारण करने से महादेव की कृपा प्राप्त होती है. 

रुद्राक्ष कई ‘मुखों’ में पाया जाता है. रुद्राक्ष के कई प्रकार और रूप हैं जिन्हें आप अपने जीवन की समस्याओं को हल करने के लिए पहन सकते हैं. ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार करता है और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी मदद करता है. रुद्राक्ष धारण करने से कई तरह की परेशानियां दूर हो जाती हैं.

रुद्राक्ष को पौराणिक हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है. रुद्राक्ष दो शब्दों ‘रुद्र’ और ‘अक्ष‘ से मिलकर बना है, जिसमें ‘रुद्र’ का मतलब भगवान शंकर और ‘अक्ष’ का मतलब आंसू होता है. शिवपुराण, पद्मपुराण, रुद्राक्षकल्प, रुद्राक्ष महात्म्य आदि शास्त्रों में रुद्राक्ष के बारे में वस्तृत महिमा बताई गई है.

रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई? How did Rudraksha originate?

रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से मानी जाती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवी सती के वियोग से भगवान शिव का हृदय द्रवित हो गया और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े जो धरती पर कई स्थानों पर गिरे. धार्मिक शास्त्रों में पाई जाने वाली पौराणिक कथाओं के अनुसार रुद्राक्ष के वृक्षों की उत्पत्ति उन्हीं स्थानों से हुई है, जहां भगवान शिव के आंसू गिरे थे. इन अश्रुओं से रुद्राक्ष नामक वृक्ष की उत्पत्ति हुई.

रुद्राक्ष क्या है? रुद्राक्ष कैसे प्राप्त होता है? What is Rudraksha? How does Rudraksha obtain?

रुद्राक्ष एक प्रकार का जंगली फल है, जो दिखने में बेर जैसा दिखता है और इसकी उत्पत्ति ज्यादातर हिमालय के क्षेत्र में पाई जाती है. रुद्राक्ष नेपाल में बहुतायत में पाया जाता है. इसका फल जामुन की तरह नीला और स्वाद में बेर जैसा होता है. यह विभिन्न आकारों और विभिन्न रंगों में उपलब्ध होता है. जब रुद्राक्ष का फल सूख जाता है तो उसके ऊपर का छिलका हटा दिया जाता है. इसके अंदर से जो गुठली प्राप्त होती है, यही वास्तव में रुद्राक्ष होता है. इस गुठली के ऊपर 1 से 21 तक या इससे भी अधिक धारियां बनी होती हैं, इन्हें मुख कहते हैं.

रुद्राक्ष की श्रेणी

रुद्राक्ष को आकार के अनुसार तीन भागों में बांटा गया है:

#1 उत्तम श्रेणी : आकार में आंवले के फल के बराबर रुद्राक्ष सबसे उत्तम माना जाता है.

#2 मध्यम श्रेणी : रुद्राक्ष जिसका आकार बेर के फल के समान होता है वह मध्यम श्रेणी में आता है.

#3 निम्न श्रेणी : चने के बराबर आकार वाले रुद्राक्ष को निम्न श्रेणी में गिना जाता है.

रुद्राक्ष जो कीड़ों से क्षतिग्रस्त या टूटा हुआ हो या पूरी तरह से गोल न हो और बिना उभरे हुए दाने का हों, ऐसे रुद्राक्ष को नहीं पहनना चाहिए. वहीं दूसरी ओर जिस रुद्राक्ष में खुद को पिरोने के लिए छेद हो, वह शुभ होता है.

रंग के आधार पर रुद्राक्ष को चार भागों में बांटा गया है.

सफेद रंग के रुद्राक्ष को ब्राह्मण वर्ग, लाल रंग का क्षत्रिय, मिश्रित रंग वैश्य और काले रंग का शूद्र कहा जाता है.

रुद्राक्ष धारण करने के वैज्ञानिक लाभ – Scientific benefits of wearing Rudraksha

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार रुद्राक्ष में विद्युत चुम्बकीय गुण होते हैं, जिसके कारण इसमें अद्भुत शक्ति होती है. ‘इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा’ के वैज्ञानिक डॉ. डेविड ली के शोध के अनुसार रुद्राक्ष विद्युत ऊर्जा के आवेश को संचित करता है. इसी कारण इसमें चुंबकीय गुण विकसित होते हैं. यह आवेश मानव मस्तिष्क में कुछ रसायनों को उत्तेजित करता है. इस प्रकार रुद्राक्ष के द्वारा चिकित्सकीय उपचार किया जाता है. रुद्राक्ष जब शरीर पर धारण करने के बाद व्यक्ति के शरीर को छूता है, तो व्यक्ति को स्वयं ही अच्छी अनुभूति होने लगती है.

रुद्राक्ष स्मरण शक्ति और बौद्धिक क्षमता को बढ़ाता है – Rudraksha enhances memory power and intellectual ability

रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता और स्मरण शक्ति में भी सुधार होता है. रुद्राक्ष को धारण करने से चिंता और तनाव संबंधी समस्याओं से राहत मिलती है. रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को मन की शांति का अनुभव होता है, जिससे व्यक्ति की ऊर्जा और उत्साह में वृद्धि होती है.

हृदय रोग में भी है फायदेमंद रुद्राक्ष – Rudraksha is also beneficial in heart disease

रुद्राक्ष को धारण करना तब भी लाभकारी माना जाता है, जब व्यक्ति को हृदय संबंधी कोई समस्या हो. रुद्राक्ष को धारण करने पर इसके विद्युतचुंबकीय गुणों के कारण शरीर के चारों ओर रक्त संचार और चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण होता है. जिस वजह से अगर इसे हृदय पर धारण किया जाए तो यह हृदय रोग, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करने में काफी कारगर होता है.

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