दुर्गा अष्टमी व्रत कथा और धार्मिक महत्व – Durga Ashtami Vrat Katha

Durga Ashtami Vrat Katha (Durga Ashtami ki Kahani) In Hindi

Durga Ashtami Vrat Katha (Durga Ashtami ki Kahani) – नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए एक पौराणिक और धार्मिक कथा (दुर्गा अष्टमी कथा आरम्भ से अंत तक) प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे शायद कुछ लोग जानते भी होंगे। हम इसे न सिर्फ जानते हैं, बल्कि उसे मानते भी हैं। हमारा मानना है कि हम जो त्योहार मनाते हैं उसके बारे में जानकारी होना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह हमारे त्योहार को और अधिक सार्थक बनाता है और हमारे उत्सव में खुशी जोड़ता है।

साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन कुछ विशेष महीनों में 9 दिन ऐसे आते हैं, जब माता रानी के लिए अर्पण किए जाते हैं। इन विशेष दिनों को “नवरात्रि (Navratri)” या “नौ दिनों का त्यौहार (Nine days festival)” कहा जाता है जिसे भारत में “माता दुर्गा (Mata Durga)” की पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र और आश्विन महीनों के आसपास नौ दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।

इस अवसर पर लोग देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं, जिसमें विशेष झांकियां बनाई जाती हैं, माता की आरती गाई जाती है और देवी मां के आगमन का स्वागत किया जाता है। इन दिनों के दौरान, लोग देवी दुर्गा का आशीर्वाद पाने और अपनी इच्छाओं को पूरा करने की कामना के लिए व्रत भी रखते हैं। 

नवरात्रि के आठवें दिन देवी दुर्गा की आठवीं शक्ति “महागौरी (Maha Gauri)” की पूजा की जाती है, और इस दिन को “अष्टमी (Ashtami)” के नाम से जाना जाता है। मां महागौरी के नाम और स्वरूप के संबंध में एक पौराणिक कथाएं (Mythological Story) भी प्रचलित हैं। साथ ही इस दिवस पर दुर्गा अष्टमी व्रत कथा पाठ (Durga Ashtami ki Kahani) भी किया जाता है।

नवरात्रि भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखने के साथ-साथ खुशी, एकता और सद्भाव की भावना को बढ़ावा देती है, जिसे लोगों के बीच एक विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में मनाया जाता है।

दुर्गा अष्टमी व्रत कथा की पूरी कहानी और दुर्गा अष्टमी कथा का माहत्म्य जानने के लिए हमारे आज के इस लेख को अंत तक जरूर पढ़े।

दुर्गा अष्टमी व्रत कथा और धार्मिक महत्व – Durga Ashtami Vrat Katha

महिषासुर एक दुष्ट राक्षस था, और उसे माँ दुर्गा (Mahishasura Mardini In Hindi) ने अपने रोद्र रूप में मारा था, जिन्हें “माँ कात्यायनी” के नाम से भी जाना जाता है। ब्रह्मा के वरदान के कारण महिषासुर को अपार शक्ति प्राप्त हो गई थी और इस कारण देवताओं के लिए उसे हराना कठिन था।

माँ दुर्गा की कहानी (Durga And Mahishasura Story In Hindi) में, वह रोद्र रूप में प्रकट हुईं और महिषासुर का वध किया और देवताओं को उसके अत्याचार से मुक्त कराया।

माँ दुर्गा के द्वारा महिषासुर वध की कथा (Durga And Mahishasura Story In Hindi)

महिषासुर का इतिहास (Mahishasur Ka Janm):

महिषासुर के पिता का नाम “रंभ” था, जो राक्षसों के राजा थे। एक दिन उनके हृदय में एक विशेष प्रकार का लगाव उत्पन्न हुआ और उन्हें एक जल भैंस यानि “महिषा” से प्रेम हो गया। इस लगाव ने उसके मन पर पूरी तरह प्रभाव डाला और उसके मन में इस भैंसे से मिलन करने की तीव्र इच्छा होने लगी।

उनकी इच्छा के परिणामस्वरूप, रंभ और जल भैंस का मिलन हुआ और उनके मिलन से “महिषासुर” का जन्म हुआ। संस्कृत में महिषासुर के नाम का अर्थ है “महिष” यानी भैंसा, इसलिए उसका नाम महिषासुर पड़ा (Mahishasur Kaun Tha)।

महिषासुर का शरीर भैंसे के समान काला और मजबूत था। उसने खुद को सबसे शक्तिशाली बनाने के लिए कई वर्षों तक भगवान ब्रह्मा की तपस्या की। महिषासुर (Mahishasur Ki Kahani) ने अपनी शक्ति और पौरुष को अत्यधिक बढ़ाने के लिए ब्रह्मा जी की तपस्या को नकारात्मक दिशा में बदल दिया।

परिणामस्वरूप, भगवान ब्रह्मा महिषासुर की तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे वरदान माँगने का अवसर दिया। महिषासुर ने अमरता का वरदान मांगा, लेकिन भगवान ब्रह्मा ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वह एक राक्षस था और उसकी अमरता की मांग को अस्वीकार कर दिया और उसे उचित वरदान दिया।

तब अहंकार में खोकर महिषासुर ने वरदान मांगा कि वह किसी भी देवता या राक्षस के हाथों नहीं मरेगा। यह वरदान मांगते समय उसने स्त्रियों को तुच्छ समझा और अपनी मृत्यु को आमंत्रित कर लिया। इस तरह, उसने अपने अहंकार और राक्षसी स्वभाव को प्रदर्शित किया, जिससे उसका अहंकार और दुष्टता बढ़ गई।

महिषासुर का आंतक (Mahishasur History In Hindi):

भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त करने के बाद, महिषासुर ने अपने राक्षसी स्वभाव के कारण उस वरदान का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। वह अब सभी पर अत्याचार करने लगा और उन्हें कष्ट देने लगा। उसके अत्याचारों से संपूर्ण मानव समुदाय और देवता भयभीत थे।

महिषासुर ने बिना किसी कारण के मनुष्यों को मारना और देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया, जिसके कारण पूरे विश्व में अधर्म स्थापित हो गया और धर्म का कोई मूल्य नहीं रह गया। उसके दुराचार के फलस्वरूप चारों ओर अधर्म फैल गया और धर्म की प्रतिष्ठा क्षीण नजर आने लगी।

पृथ्वी पर आतंक फैलाने के बाद महिषासुर ने इंद्र की नगरी अमरावती पर भी आक्रमण कर दिया, और उसने सभी देवताओं को पराजित कर दिया। उसकी असुर सेना के सामने कोई भी टिक पाने में सामर्थ्य नहीं था। इस कठिन समय पर, सभी देवता भगवान शिव और विष्णु की शरण में जाकर सहायता मांगने गए, और उन्होंने अपनी समस्याओं को उनके सामने रखा।

तब देवताओं के साथ मौजूद भगवान शिव और विष्णु ने मिलकर महिषासुर की सेना से युद्ध किया, लेकिन महिषासुर को अजेय होने का वरदान मिलने के कारण वे भी उसे हरा नहीं सके। इस पर देवताओं का क्रोध और निराशा फूट पड़ी, क्योंकि वे अपने प्रयासों में विफल रहे थे।

माँ दुर्गा का जन्म (Mahishasura Mardini In Hindi):

तब त्रिमूर्ति, जिनमें भगवान ब्रह्मा, विष्णु, और महेश शामिल थे, मिलकर एक योजना बनाई जिससे कि महिषासुर और उसकी सेना को पूरी तरह से नष्ट किया जा सके। इस योजना के अंतर्गत, तीनों देवताओं ने अपने क्रोध की शक्ति को एकत्र किया और एक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति को उत्पन्न किया। साथ ही, सभी देवताएं ने भी इस योजना में अपना-अपना योगदान दिया, जिससे इस कठिन प्रलयकारी युद्ध को जीतने की संभावना बढ़ गई।

त्रिमूर्ति और सभी देवताओं की तेज ऊर्जा से एक शक्तिपुंज का निर्माण हुआ, जिसमें से माँ दुर्गा का “कात्यायनी” रूप प्रकट हुआ (Maa Durga Ki Kahani In Hindi)। इस रूप की विशेषता यह थी कि वह अत्यंत भयानक और महाकाली थी, जिनके दस हाथ थे।

इसके बाद, भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र, और सभी देवताओंने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र माँ कात्यायनी को सौंप दिए, जिससे उनकी शक्तियों को और भी महाभव्य कर दिया और उनको शत्रु महिषासुर को पराजित करने में मदद मिली।

माँ दुर्गा व महिषासुर का युद्ध (Mahishasur Vadh Story In Hindi):

इसके बाद, माँ दुर्गा (Goddess Durga Story In Hindi) महिषासुर की सेना के पास गई और वहां जोर-जोर से गर्जने लगी। उन्होंने अपने विकट रूप को प्रकट किया, जिससे महिषासुर की सेना को भयानक डर और आश्चर्य के साथ चकित कर डाला। महिषासुर के साथ, असुरों की भरपूर सेना भी थी, जिसमें करोड़ों असुर थे, जबकि दूसरी ओर माँ दुर्गा अकेली थी, लेकिन उनकी शक्ति और वीरता असीम थी (Maa Durga And Mahishasur Ki Ladai)।

किंतु माँ दुर्गा ने शत्रु सेना में भयंकर अराजकता और हाहाकार मचा दिया। सिंह पर बैठी माँ दुर्गा की गर्जना इतनी डरावनी थी कि उससे चारों ओर भय का वातावरण उत्पन्न हो गया (Ma Durga Ne Kyon Kiya Tha Mahishasur Ka Vadh)। फिर, माँ ने अपने अस्त्रों की शक्ति का उपयोग करके शत्रु सेना में भयंकर हानि पहुंचाई। यह युद्ध नौ दिनों तक चलता रहा, और माँ दुर्गा बिना किसी थकान के लगातार असुरों का नाश कर रही थी।

धीरे-धीरे, महिषासुर के सभी साथी, सैनिक, मंत्री, और सेनापति जीवन संग्राम से विमुक्त हो गए। आखिरकार, दसवें और अंतिम दिन, महिषासुर ने माँ दुर्गा के साथ युद्ध किया। तब माँ दुर्गा ने भगवान शिव के त्रिशूल द्वारा महिषासुर का वध (Mahishasur Ka Vadh) कर दिया। इस प्रकार, माँ दुर्गा के प्रबल रूप ने महिषासुर को उसकी दुष्ट राक्षसी सेना के साथ सम्पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया और धर्म के पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

श्री दुर्गा अष्टमी व्रत कथा का धार्मिक महत्व

भारतीय हिन्दू धर्म में श्री दुर्गा अष्टमी व्रत कथा का धार्मिक महत्व बहतु अधिक है, और यह व्रत नवरात्रि के आठवें दिन को मनाया जाता है। श्री दुर्गा अष्टमी व्रत कथा का महत्व उनके प्रति भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करता है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है और उनके अवतार की कहानी सुनी जाती है।

दुर्गा अष्टमी का व्रत नारी शक्ति का प्रतीक है, जो मां दुर्गा के रूप में प्रकट होती है। इसके जरिए महिलाएं अपनी ताकत और साहस का अहसास करती हैं और उन्हें अपने जीवन में सफलता हासिल करने में सहयोग करती हैं।

नवरात्रि का आठवां दिन, जो कि श्री दुर्गा अष्टमी होता है, देवी दुर्गा के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन का व्रत रखने से भक्तों को जीवन में सुख, समृद्धि और मां दुर्गा का आशीर्वाद मिलता है।

दुर्गा अष्टमी व्रत कथा सुनने और मां दुर्गा की पूजा करने से व्यक्ति को खुद को भगवान के प्रति समर्पित करने का अवसर मिलता है। यह धार्मिकता और आध्यात्मिकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

दुर्गा अष्टमी के त्योहार के दौरान लोग एक साथ आते हैं और समाज में एकता का संदेश फैलाते हैं। इस अवसर पर धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं, जिससे समुदाय की एकता बढ़ती है।

दुर्गा अष्टमी के त्योहार के दौरान, परिवार के सभी सदस्य एक साथ आते हैं और पूजा का आयोजन करते हैं, जिससे पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं।

इस प्रकार, श्री दुर्गा अष्टमी व्रत कथा धार्मिक और सामाजिक महत्व से भरपूर है और यह हिंदू समुदाय में उनकी पूजा के माध्यम से मां दुर्गा की महिमा का स्मरण कराती है।

श्री दुर्गा अष्टमी व्रत की पूजा विधि क्या है?

अष्टमी के दिन मां महागौरी (Mahagauri) की पूजा की जाती है जो देवी दुर्गा (Devi Durga) का आठवां स्वरूप हैं। अष्टमी के दिन स्नान करने के बाद देवी दुर्गा को सोलह श्रृंगार करके पूजा करनी चाहिए। इस दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, इसलिए इस दिन मिट्टी के नौ घड़े रखकर देवी दुर्गा के नौ रूपों का ध्यान और आह्वान किया जाता है।

श्री दुर्गा अष्टमी व्रत की पूजा विधि अलग-अलग स्थानों और परंपराओं के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है, लेकिन मुख्य रूप से एक सामान्य विधि यहां दी गई है:

श्री दुर्गा अष्टमी व्रत सामग्री:

  • माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र
  • कुमकुम, हल्दी, अबीर, गुलाल, रंगोली और फूल
  • गोलू, धूप, दीप, आरती की थाली
  • बाजूबंद, चूड़ियाँ, सिन्दूर, सुहाग का सामान
  • पूजा के लिए ब्राह्मण और ब्राह्मणी भोजन

श्री दुर्गा अष्टमी व्रत पूजा विधि:

  • पूजा स्थल की तैयारी: पूजा स्थल को साफ करें और यहां एक चौक बनाएं। उस स्थान को धूप, दीप और आरती की थाली से सजाएं।
  • मां दुर्गा का अभिषेक: पूजा स्थल पर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर रखें। प्राण प्रतिष्ठा के लिए देवी मां की मूर्ति पर कुमकुम, हल्दी, अबीर और गुलाल से स्वस्तिक चिन्ह बनाएं।
  • अष्टमी व्रत कथा का पाठ: अष्टमी व्रत कथा का पाठ करें, जो मां दुर्गा के महत्व को दर्शाती है।
  • पूजा की आरती: आरती की थाली में दीपक और कुमकुम का तिलक लगाकर मां दुर्गा की आरती करें।
  • प्रसाद की तैयारी: प्रसाद तैयार करें और इसे पूजा के ब्राह्मण को दें। आप देवी मां को प्रसाद के रूप में हलवा, नारियल, खीर और चने का भोग लगा सकते हैं.
  • व्रत का उपवास: इस दिन व्रत रखें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • पूजा के ब्राह्मण का सम्मान करें: व्रत के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं और उनसे आशीर्वाद लें।
  • सभी को प्रसाद देना: पूजा का प्रसाद सभी गरीबों, बच्चों और बूढ़ों को दें।

इस रूप में श्री दुर्गा अष्टमी व्रत की पूजा की जाती है। यह पूजा भक्तों के लिए देवी दुर्गा की पूजा करने और आशीर्वाद पाने के लिए एक प्रतिष्ठित त्योहार है।

मां महागौरी देवी अन्नपूर्णा (Devi Annapurna) का ही रूप हैं। इस दिन मां अन्नपूर्णा की भी पूजा की जाती है इसलिए अष्टमी के दिन कन्याओं को भोजन करा सकते हैं और किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन करा सकते हैं। अगर आप पूजा-हवन करते रहते हैं तो 9 कन्याओं को भोजन अवश्य खिलाएं।

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