ड्रैकुला वास्तव में कौन था? Dracula History Story in Hindi

Dracula History Story in Hindi

Dracula History Story in Hindi – बचपन से हम किस्से-कहानियों में सुनते आ रहे हैं कि एक ड्रैकुला हुआ करता था, जो लोगों का खून पीता था। लेकिन क्या सचमुच कोई ड्रैकुला था? और क्या वह सचमुच खून पीने वाला एक निशाचर (Nocturnal) था? 

ड्रैकुला पर कई उपन्यास लिखे गए हैं और कई फिल्में भी बनाई गई हैं। इन उपन्यासों और फ़िल्मों में ड्रैकुला का बहुत महिमामंडन किया गया है, कुछ फ़िल्मों में उसे नायक बताया गया है तो कुछ फ़िल्मों में उसे खलनायक बताया गया है। लेकिन आज हम आपको ड्रैकुला की सच्ची कहानी और इतिहास से रूबरू कराएंगे।

ड्रैकुला का इतिहास (Dracula History in Hindi)

ड्रैकुला, जिसे व्लाद टेपेश (Vlad Tepes) या व्लाद द इम्पेलर (Vlad the Impaler) के नाम से भी जाना जाता है, एक रूमानियाई प्रिंस था जिसका अस्तित्व 15वीं सदी के आसपास बताया जाता है। व्लाद टेपेश का नाम “ड्रैकुला (Dracula)” इसलिए प्रसिद्ध हुआ क्योंकि वह अपने दुश्मनों के खिलाफ बर्बरता के साथ कई बार क्रूर और विभत्तस्क तरीकों से पेश आता था, जिसमें खून की बरबरता भी शामिल थी।

व्लाद टेपेस को ड्रैकुला के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है “ड्रैगन (Dragon)”, यानी ड्रैगन या ड्रैगन जैसा। ड्रैकुला या ड्रैगन का प्रयोग उसकी बर्बर एवं डरावनी विचारधारा एवं कार्यों के सन्दर्भ में किया जाता था।

व्लाद टेप्स की कहानी ने बाद में ब्रैम स्टोकर (Bram Stoker) के उपन्यास “ड्रैकुला” को प्रेरित किया, जिसमें चरित्र व्लाद टेप्स को डरावनी कहानी के एक प्रमुख खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

ड्रैकुला की कहानी (Vlad the Impaler story in Hindi)

यह घटना उस समय की है जब ओटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) और यूरोपीय क्रुसेडर्स (European Crusaders) के बीच एक निर्णायक धार्मिक और रणनीतिक संघर्ष चल रहा था, जिसे क्रूसेड (Crusades) के नाम से जाना जाता है। यह संघर्ष 15वीं सदी की शुरुआत में हुआ था और इसमें ओटोमन साम्राज्य और यूरोपीय क्रुसेडर्स द्वारा एक-दूसरे की सीमाओं पर बार-बार हमले शामिल थे।

इतिहास में इस समय धर्म और भूमिका पर आधारित ये संघर्ष बहुत महत्वपूर्ण थे। क्रुसेडर्स, जो अक्सर यूरोप से आते थे, धार्मिक उत्साह और पवित्र भूमि, यरूशलेम पर पुनः कब्ज़ा करने के लक्ष्य के साथ यूरोप से बाहर निकाल दिए गए थे। उनका मानना था कि यह धर्म युद्ध उनकी आत्मा की रक्षा और स्वर्ग प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

विरोध में, ओटोमन साम्राज्य, जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों के रूप में जाना जाता है, यूरोप के खिलाफ एक प्रमुख संघर्षी था और वे यूरोप की सीमाओं पर हमला करते थे।

इतिहास में इस दौरान कभी क्रुसेडर्स की जीत हुई तो कभी ओटोमन साम्राज्य की। ये संघर्ष कई दशकों तक जारी रहे, और इसके परिणामस्वरूप क्रुसेडर्स और ओटोमन साम्राज्य से जुड़ी कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ और संघर्ष हुए।

वर्ष 1462 में ऑटोमन सुल्तान सुल्तान मुहम्मद (Sultan Muhammad) ने एक विशाल सेना इकट्ठा करने का निर्णय लिया। उनका लक्ष्य यूरोपीय भूमि पर अपने साम्राज्य का विस्तार करने के प्रयास में पूर्वी यूरोप पर आक्रमण करना था।

सुल्तान मुहम्मद की विश्व विजय का मुख्य लक्ष्य यह दिखाना था कि ओटोमन साम्राज्य का साम्राज्य यूरोप से परे फैल रहा था और वह यूरोप के विरुद्ध अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता था।

इस धावे के परिणामस्वरूप, सुल्तान मुहम्मद की सेना ने वलाचिया और ट्रांसिल्वेनिया सहित पूर्वी यूरोप के कई क्षेत्रों पर हमला किया।

मुहम्मद की सेनाएँ वलाचिया (Wallachia) पहुँचीं और उन्हें वहां सबसे भयावह दृश्य का सामना करना पड़ा। वहां उन्होंने देखा कि लगभग 23 हजार शव खूंटियों पर लटके हुए थे। इन लाशों को एक लंबी कतार में लटकाया गया था और उनके शरीर में भाले चुभोये गए थे जो उनके सिर के पार निकले हुए थे। 

शवों की ये कतार कुल 100 किलोमीटर लंबी थी। सुल्तान मुहम्मद और उनकी सेना के लिए यह दृश्य अनोखा और भयावह था। ऑटोमन तुर्क भी अपनी क्रूरता के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनसे भी यह दृश्य सहन नहीं हुआ। इस दृश्य ने सुल्तान मुहम्मद और उनकी सेना को हैरान और भयभीत कर दिया। 

अपने सामने उभर रहे भयावह दृश्य को देखकर सुल्तान ने कहा, “जो व्यक्ति अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए इस हद तक जा सकता है, उसे अपने राज्य को सुरक्षित रखने का पूरा अधिकार है।” इस प्रकार, सुल्तान ने वलाचिया को जीतने का इरादा छोड़ दिया और एक अद्भुत और भयानक दृश्य को पीछे छोड़ते हुए वापस लौट गया।

ड्रैकुला असल में कौन था?

यह कहानी एक रहस्यमय और डरावनी कहानी है जो एक वकील की अनूठी प्रतिबद्धता और ड्रैकुला जैसे अद्वितीय पारंपरिक चरित्र की शक्ति की गवाही देती है।

कहानी के अनुसार, एक बड़ी हवेली, जो अंधेरे और रहस्य के साये से घिरी हुई थी, उसमे एक काले कोट वाला वकील बिना आहट के हवेली के अंदर प्रवेश करता है। हवेली का मालिक बूढ़ा था और उसकी त्वचा इतनी सफेद थी कि ऐसा लगता था जैसे उसके शरीर से खून की आखिरी बूंद भी निचोड़ ली गई हो। 

उस बूढ़े आदमी का सपना था कि वह लंदन में एक नया घर खरीदना चाहता है और इसलिए वह वकील से कुछ दिनों के लिए हवेली में रहने और काम पूरा होने के बाद चले जाने के लिए कहता है। वकील इस प्रस्ताव को स्वीकार कर तैयार हो जाता है फिर एक रात के बाद दूसरी और तीसरी रात बीत जाती है।

हर रात के बाद जब वकील सुबह उठता है तो पाता है कि उसके शरीर का रंग बदलता जा रहा है। वहीं, हवेली के पुराने मालिक की चमक फिर से लौटने लगी है और उनकी त्वचा जवान होती जा रही है। यह एक अनोखी और रहस्यमयी घटना घटित हो रही है, जिसके फलस्वरूप वकील के शरीर में दिन-ब-दिन परिवर्तन होते जा रहे हैं।

एक महीने बाद, वकील को पता चला कि वह अस्पताल में है और उसके शरीर से लगभग सारा खून निकाला जा चुका है। ऐसा करने वाला व्यक्ति काउंट ड्रैकुला था, जो एक बहुत ही प्राचीन और डरावना पिशाच था जिसका चरित्र कहानियों और मिथकों में प्रसिद्ध है।

1897 में ब्रॉम स्ट्रोकर (Brom Stroker) ने अपने एक उपन्यास “काउंट ड्रैकुला (Count Dracula)” नामक काल्पनिक पात्र को दुनिया भर में मशहूर कर दिया। यह काल्पनिक चरित्र एक पिशाच (Vampire) का प्रतिनिधित्व करता है जो अन्य लोगों का खून पीकर युवा बना रहता है। ड्रैकुला एक पिशाच था जिसमें सूरज की रोशनी के प्रति कोई प्रतिरक्षा नहीं थी और वह इच्छानुसार भेड़िये का रूप ले सकता था।

इस काल्पनिक चरित्र की मूल कहानी वियाडे ड्रैकुला (Viade Dracula) नामक एक ऐतिहासिक व्यक्ति से आई है। व्लाद ड्रैकुला, जिसे “व्लाद ड्रैकुला (Vlad Dracula)” कहा जाता है, जो 15वीं शताब्दी का एक रोमानियाई राजकुमार था। उसने अपना नाम ड्रैकुला के नाम से जाना, और उसकी क्रूरता और वीरता की कहानियों ने ब्रॉम स्ट्रोकर को इस काल्पनिक पिशाच चरित्र को बनाने के लिए प्रेरित किया।

इस उपन्यास के माध्यम से ड्रैकुला पिशाच की कहानी को अपने समय के चरित्र को अनोखे और रोमांचक तरीके से प्रस्तुत किया गया और यह चरित्र आज भी लोगों की पसंदीदा कहानियों में से एक है।

यह घटना 15वीं सदी की है, जब पूर्वी यूरोप में एक राज्य था, जिसे 21वीं सदी में हम रोमानिया देश (Romania) के नाम से जानते हैं। उस समय इस राज्य का नाम वैलाचिया था और यह ज्ञात था कि यह राज्य भूमि के पूर्वी भाग का हिस्सा था। इस राज्य के राजा का नाम व्लाद द्वितीय (Vlad II) था।

वैलाचिया राज्य, जिसे आज हम रोमानिया के नाम से जानते हैं, ओटोमन साम्राज्य की सीमा से लगा हुआ था। 15वीं शताब्दी में यूरोप और ओटोमन साम्राज्य के बीच एक निर्णायक लड़ाई चल रही थी और इस लड़ाई में वैलाचिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वैलाचिया के राजा और उनकी सेना ने यूरोप के साथ-साथ ऑटोमन साम्राज्य के खिलाफ भी अथक संघर्ष किया।

वैलाचिया को यूरोप में प्रवेश करने के लिए यूरोपीय सीमाओं को पार करना पड़ता था, और इसका मतलब था कि वैलाचिया एक प्रकार के “फ्रंट” के रूप में कार्य करता था, जिसका उद्देश्य ओटोमन साम्राज्य के हमलों को रोकना और उनके विस्तार को रोकना था। इसलिए वलाचिया के राजा व्लाद द्वितीय का योगदान महत्वपूर्ण था, और अपने साहसी कार्यों के माध्यम से वलाचिया ने अपनी स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा की।

उस समय, यूरोप में ईसाई धर्म के योद्धाओं का एक संगठन मौजूद था, जिसका मिशन था धर्मिक और सामाजिक मुद्दों के लिए लड़ना। व्लाड भी इस संगठन का सदस्य था, और इसके परिणामस्वरूप उन्हें एक उपाधि मिली थी, जिसे “ड्रैक्यूल” कहा जाता था। जब हम “ड्रैक्यूल” का अर्थ देखते हैं, तो इसका मतलब होता है “ड्रैगन”।

व्लाद ड्रैक्यूल अपने राज्य में बढ़ते विद्रोह के साथ समय बिता रहे थे। उनके पड़ोस में हंगरी नामक एक और राज्य था, जो इन विद्रोही सामंतों को समर्थन देता था। इस विवाद के समय, जिसमें उनकी गद्दी की सुरक्षा संकट में थी, व्लाद ने विद्रोही सामंतों के समर्थन को रोकने और अपने राज्य की सुरक्षा को बनाए रखने के लिए ऑटोमन तुर्कों की ओर से मदद की याचना की।

1442 में, व्लाद ने अपनी गद्दी को बचाने के लिए सुल्तान मुहम्मद के पास सुलह की प्रस्तावना दी। सुल्तान मुहम्मद सुलह को स्वीकार कर लिया, लेकिन इसके साथ ही दो शर्तें रखी गईं। पहली शर्त थी कि वलेकिया हर साल सुल्तान को एक निश्चित टैक्स अदा करना था, और दूसरी शर्त थी कि व्लाद अपने दो पुत्रों, मिरसिया और व्लाद द थर्ड, को सुल्तान की सेवा में भेजेंगे। 

व्लाद ड्रैक्यूल के तीन पुत्रे थे, जिनमें मिरसिया, व्लाद द थर्ड, और राडु शामिल थे। मिरसिया व्लाद ड्रैक्यूल के सबसे बड़े बेटे थे और उनके उत्तराधिकारी वारिस भी थे। इसलिए उन्होंने व्लाद द थर्ड और राडु को सुल्तान मुहम्मद की सेवा में भेज दिया। यह निर्णय उनके परिवार के बड़े बेटे मिरसिया के दायरे कार्यक्षेत्र को बनाए रखने के लिए लिया गया था, जिससे उनका परिवार और उनका राज्य सुरक्षित रह सकता था।

इस सेवा को कैद के एक रूप के रूप में देखा जा सकता है, जिससे व्लाद थर्ड और राडू पर तुर्की तरीकों को अपनाने के लिए दबाव में रखा जाता था। अंततः राडू ने इस दबाव के आगे झुककर इस्लाम स्वीकार कर लिया और तुर्कों के अधीन रहना स्वीकार कर लिया। हालाँकि, व्लाद थर्ड इस बात से सहमत नहीं थे। व्लाद को इसकी सजा भुगतनी पड़ी, मुसीबतें झेलनी पड़ीं, यातनाएं झेलनी पड़ीं, लेकिन फिर भी व्लाद थर्ड ने अपने मूल धर्म को त्यागकर हार नहीं मानी।

उस समय, उनके पिता भी संकट में थे, जिसका मतलब था कि व्लाद थर्ड और उनके परिवार के लिए यह वास्तव में कठिन समय था।

ड्रैकुला का बदला 

1447 में सामंतों ने एक बार फिर विद्रोह कर दिया और इस विद्रोह के दौरान व्लाद ड्रेकुल को सत्ता से उखाड़ फेंका गया। विद्रोह का नेतृत्व बड़े पैमाने पर व्लादिस्लाव नाम के एक व्यापारी ने किया था, और उसने व्लाद द्वितीय के खिलाफ आजीवन कारावास का आरोप लगाया और उसे राजा के रूप में पदच्युत करने का प्रयास किया।

इस घटना के कुछ समय बाद, व्लाद थर्ड कैद से भाग निकला और वलाचिया लौट आया। इस समय जब वे वलाचिया लौटे तो उन्हें अत्यंत दुखद समाचार सुनना पड़ा कि उनके पूरे परिवार की हत्या कर दी गई है। यह घटना व्लाद थर्ड के लिए बेहद दर्दनाक और दुखद समय थी, जिसने उनके जीवन को दूसरी दिशा में मोड़ दिया।

उनके पिता को मार डाला गया और उनके घर के पीछे दफना दिया गया था, जबकि उनके भाई मिर्सिया को गंभीर यातना के बाद जिंदा दफना दिया गया था। व्लाद थर्ड इन अत्यंत दुखद और दरिद्र क्रूरताओं की खबर से बहुत आहत हुआ और उसने बदला लेने की कसम खाई। परिणामस्वरूप, उसने एक सेना इकट्ठी की और व्लाडिसलाव के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध के माध्यम से, व्लाद थर्ड ने अपने परिवार और अपने राज्य के नाम पर क्रूर बदला लेने का प्रयास किया।

युद्ध के मैदान में, व्लाद ने व्लादिस्लाव का सिर काटकर और अपने पिता की तरह उनके आभूषण पहनकर अपने पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद, व्लाद थर्ड ने खुद को वैलाचिया का नया राजा घोषित कर दिया, जिससे वह अपने पिता के उत्तराधिकारी बने और राजा के रूप में शासन करने लगे। 

व्लाद थर्ड ने अपने पिता की तरह ड्रैकुला की उपाधि अपनाई और अपने नाम के अलावा “व्लाद ड्रैकुला” के नाम से जाना जाने लगा। हालाँकि, उनका एक और प्रसिद्ध नाम था, जिसे पूरे यूरोप में पहचाना जाता था, “व्लाद द इम्पेलर (Vlad the Impaler)”।

“इम्पेलर” का अर्थ होता है “छेद करने वाला”। व्लाद का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वह अपने दुश्मनों को भाले से छेद कर लटका दिया करता था। यूरोपियन इतिहास में, व्लाद ड्रैक्युला को सबसे क्रूस शासक के तौर पर जाना जाता था और उसके दुश्मन उसे “शैतान की औलाद” कहते थे। उसे ये नाम उसके तौर तरीक़ों के चलते मिला था, क्योंकि वह अपने दुश्मनों के प्रति बेहद क्रूर और निर्मम थे, और उन्होंने अपने शासनकाल में अनेक अत्याचारिक क्रियाएँ की थी।

सत्ता में आने के कुछ साल बाद कुछ लोगों ने व्लाद ड्रैकुला के खिलाफ विद्रोह करने की कोशिश की। व्लाद अपने पिता की गलती को दोहराना नहीं चाहता था और उसने फैसला किया कि वह इस विद्रोह का सख्ती से जवाब देगा।

व्लाद ने सभी लोगों को दावत पर बुलाया और दावत के बीच में ही उसने अपने मुख्य दुश्मनों पर चाकुओं से वार कर दिया। उसने न केवल अपने दुश्मनों को मार डाला बल्कि उनके शरीर को भालों से छेद दिया और उनके शवों को शहर के विभिन्न स्थानों पर लटका दिया, जिससे यह सभी के लिए एक भयानक दृश्य बन गया।

व्लाद ड्रैकुला अपने शत्रुओं के प्रति क्रूर था, लेकिन यूरोप के लोग उसे मसीहा मानते थे, विशेषकर पोप, जो उसे नायक कहते थे। इसके पीछे कारण यह था कि व्लाद ने तुर्क सैनिकों के साथ इतना क्रूर व्यवहार किया था कि वे यूरोप की सीमा में प्रवेश करने से डरते थे। उनकी साहसी और शक्तिशाली रणनीतियों ने यूरोप को उस समय के तुर्क आक्रमण से बचाया, जिसके कारण उन्हें मसीहा के रूप में प्रचारित किया गया।

व्लाद ड्रैकुला ने एक बार दो भाइयों को जिंदा उबाल दिया था और फिर उनके परिवार को सूप पीने के लिए मजबूर कर दिया था। एक अन्य घटना में, उसने तुर्क सैनिकों के सिर में कीलें ठोंक दीं थी क्योंकि उन्होंने अपने सिर से साफ़ा उतारने से इनकार कर दिया था। इन क्रूर कार्यों के माध्यम से, व्लाद ड्रैकुला ने अपने दुश्मनों को डराने और आतंकित करने का प्रयास किया।

व्लाद ड्रैकुला का आतंक यूरोप और ओटोमन्स के बीच इतना था कि उसके बारे में कहानियाँ बनाई जाने लगीं। इन कहानियों में दर्शाया गया था कि व्लाद ड्रैकुला अपने दुश्मनों के खून में डूबी हुई ब्रेड खाता है। इसके बाद ड्रैकुला नाम भी एक काल्पनिक पात्र बन गया और कहानियों में इसका जिक्र किया जाने लगा। हालाँकि व्लाद ड्रैकुला ने वलाचिया पर केवल 7 वर्षों तक शासन किया, लेकिन उस दौरान उसने अनोखे तरीके से 80 हजार लोगों की हत्या कर दी, इस दौरान वह एक बड़ा तानाशाह बन गया था।

ड्रैकुला का अंत कैसे हुआ?

1462 में, ओटोमन सल्तनत के सैनिकों ने वलाचिया पर हमला किया। व्लाद ड्रैकुला ने हमले से बचने के लिए हंगरी से मदद मांगी, लेकिन हंगरी के राजा ने ओटोमन सल्तनत के साथ सीधे संघर्ष नहीं करने का फैसला किया। इसके बजाय, हंगरी के सैनिकों ने व्लाद ड्रैकुला को पकड़ लिया।

व्लाद ड्रैकुला के पत्नी की हत्या कर दी और उसका राज्य छीन लिया गया और उसके भाई को भी सौंप दिया गया, जिससे वलाचिया का राज्य ओटोमन सल्तनत के अधीन हो गया। इस समय, व्लाद ड्रैकुला को ओटोमन सुल्तान सुलेमान द मैग्निफ़िसेंट द्वारा कैद कर लिया गया था और आगे उन्हें अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

यूरोपियन मिथकों के अनुसार, व्लाद ड्रैक्युला क़ैद में रहते हुए अपने दुश्मनों को श्राप दिया था कि जिन्होंने उनके ख़ानदान को तबाह किया है, उनका भी सर्वनाश हो जाए। एक दिन, व्लाद को इस अभिशाप को सच करने का एक आखिरी मौका भी मिला। वह हंगरी की जेल से रिहा होने में कामियाब रहा, लेकिन एक साल के भीतर ओटोमन तुर्कों से लड़ते हुए उसकी मृत्यु हो गई। तुर्क सैनिकों ने उसका सिर काटकर पूरे कॉन्स्टेंटिनोपल (इस्तांबुल) में घुमाया और फिर उसे ले जाकर सुल्तान मुहम्मद के कदमों में रख दिया।

तीन शताब्दियों के बाद, ब्रॉम स्ट्रोकर ने “ड्रैकुला” नामक एक उपन्यास लिखा, जिसने ड्रैकुला की कहानी को दुनिया भर में प्रसिद्ध कर दिया। इस उपन्यास के बाद, ड्रैकुला की कहानी को कई फिल्मों, नाटकों और किताबों में प्रस्तुत किया गया है।

हालाँकि, यह भी सच है कि स्ट्रोकर के ड्रैकुला और ऐतिहासिक ड्रैकुला में कुछ मिथकों को छोड़कर, नाम के अलावा बहुत कुछ समानता नहीं है। ब्रॉम स्ट्रोकर की ड्रैकुला की एक खास बात यह थी कि उन्होंने ड्रैकुला को अपने हाथों में एक पिशाच के रूप में प्रस्तुत किया, जो उनकी कहानी को एक नया और रोमांचक आयाम देता है।

ऐसा माना जाता है कि जब व्लाद ड्रैकुला की कब्र खोदी गई तो वहां न तो उनकी लाश थी और न ही उनका कोई निशान था। कुछ कहानियों के अनुसार ड्रैकुला ने श्राप दिया था कि वह मरने के बाद जीवित लौटेगा और अपने दुश्मनों से बदला लेगा।

ब्रॉम स्ट्रोकर की काल्पनिक ड्रैकुला भी ऐसी ही है। उनका किरदार हर सुबह अपनी कब्र में सोता है और केवल रात में खून पीने के लिए उठता है। किरदार को एक पिशाच के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो रात में खून पीता है।

इन कहानियों में एक रहस्यमय और आध्यात्मिक अनुभूति है, जो मृत्यु से परे जीवन की अपार शक्ति और कैद से भागने और वापस लौटने की संभावना की ओर इशारा करती है।

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